
Tuesday, June 9, 2009
Wednesday, August 13, 2008
हरे साँप की कविता
क हते हैं उदासी का एक मौसम होता है। जेनुइन किस्म की उदासी हर किसी को नहीं मिलती। भले लोग इसके लिए यहाँ-वहाँ, न जाने कहाँ-कहाँ भटकते हैं। यूँ देखें तो उदास होने के लिए कुछ खास नहीं चाहिए-बस एक कोना, लटकाने लायक एकाध चेहरा और नामालूम कारण। मगर किसी को कोना नहीं मिलता, किसी का चेहरा लटकाने लायक नहीं होता, अधिकांश को बहुत सारे कारण पता होते हैं। ऐसी स्थिति में एक साफ-सुथरी, स्पष्ट, गहरी और दिल मारने वाली उदासी शरीफ लोगों की अधूरी चाह बनकर रह जाती है।
हम दोनों अक्सर जेनुइन उदासी की तलाश में घूमते रहे हैं। गुरुदत्त की फिल्में किराये के वी.सी.आर. पर देखकर एकाध टेम्प्रेरी किस्म की उदासी खींची भी है। पर जिसे कहते हैं ‘लाइट एंड शेड’ का असली कमाल, वो किसी भी शाम इस तरह से कमरे में उतरकर नहीं आया। निर्मल वर्मा की मदद भी कुछ खास काम न आ सकी। गुलजार ने कहा है-उदास हों तो अगरबत्ती की तरह जलें यानी सुलगें, राख हों मगर औरों को खुशबू देना चाहिए। हम परफ्यूमरी के लघु उद्योग की इस मॉडलिंग में भी सफल न हो सके।
आखिर दोनों उठे और खिडकी के पास आ बैठे।
आदमी को उदासी की तलाश कहाँ से कहाँ पहुँचा देती है।
‘बारिश के ठीक बाद की सडक। थोडे-बहुत गुलमोहरों के मिट्टी पर पडे टुकडे-फूल या पत्ते। सुबह जब लोग झाडू लगाएंगे तो एक पीला-लाल ढेर कोने में पडा होगा,’ उसने कहा। मैंने सोचा अब वह कहेगी, ‘उस झाडी में एक बार तुम रुमाल गिरा गए थे। मैंने वह रुमाल उठाया और हर-सिंगार बांधकर तुम्हें लौटा दिया था। अब सच बताऊँ? वह झाडीवाला रुमाल माली का लडका लाकर दे गया था। मैं खिडकी में तब उदास बैठी थी।’ लेकिन वह बोली, ‘रुमाल हरे रंग का था या सफेद रंग का?’ मुझे याद है कि वह सफेद था, पर कुछ गम पाने के इरादे से मैंने हरा बताया। वह-‘झूठ’ बोली और खूब हँसी। फिर मामला हाथ से फिसल पडा।
उदासी लुट गई। मैं लुटा-पिटा खडा हो गया।
हम लॉन में चले आए। काफी हरी घास थी। उसने कहा-‘घास हरी न होती तो?’
‘पीली या नीली होती!’
‘हरेपन में जीवन प्रतिध्वनित होता है। पीला, जीवन की रुग्णता का प्रतीक है। घास में जीवन रहने दो। इसे हरा ही होना चाहिए।’
लॉन की हरी घास के बारे में मशहूर है कि सावन के अंधे की नेत्र-ज्योति इसी ने क्षीण की है। गधों के तृप्ति संबंधी किस्से घास-केन्द्रित ही होते हैं। हम दोनों वर्णान्धता पर केन्द्रित परिचर्चा में उदासी पैदा करने की कोशिश करने लगे। आदमी अगर परिचर्चा करने लगे तो उसकी आधी ऊर्जा ‘कुछ’ ढूंढने में लग जाती है। चूँकि हम शुरू से ‘कुछ’ यानी उदासी ढूंढ रहे थे इसलिए ऊर्जा को ज्यादा दिक्कत नहीं हुई। हमने घास का एक-एक टुकडा हाथ में लिया। शास्त्रीयता के अनुसार परिचर्चा को घूम-फिर कर ओस की बूँद पर गिरना था। इसके बाद प्रकाश अपवर्त्तन से इन्द्रधनुष तथा उसका बूँद गिरते ही टूटना। करीबी दिल से निकलकर हाथ पर आ जाती। हाथ की करीबी जेनुइन उदासी की ओर एक सार्थक चरण है।
हम लगभग पूरी तरह या यों कहें कि बुरी तरह इसके लिए मरे जा रहे थे, लेकिन, रूपक एक हस्तक्षेप की वजह से बँधने से रह गया। यह हस्तक्षेप लॉन के किनारे, सुन्दर-सी क्यारी के खामोश से कोने से हुआ।
वहां कुछ रेंग रहा था। उसने कहा-‘साँप है।’ मैंने कहा- ‘भ्रम है।’ उसने कहा - ‘हरा है।’ मैंने कहा- ‘घास है।’ उसने कहा- ‘देखो वह मुडा और पत्थर की चपटी सतह पर जा बैठा।’ मैंने कहा- ‘एकल कविता पाठ के पहले का कोई सीन तुम्हारे जेहन में अटका रह गया होगा।’ वह मोहित होने लगी, मुझे भ्रम घेरने लगा। साँप जो उसकी दृष्टि में उग आया था अपने हरेपन की वजह से मुझे भी सम्मोहित करने लगा। जैसे कोई सभागार, उसमें मंचीय चबूतरा, एक कवि, उसके कंधों पर हरी शाल, गालों में दबकर गुल-गुल करके कुल्ला हो गई हँसी। शाल झूम रही है। कविता निकल रही है। हरा साँप झूम रहा है।
चमकीला हरा, लपलपाता, गिज-गिज, कुनमुन-कुनमुन साँप। ‘अज्ञेय का साँप ललछौंहा था,’ मैंने यह स्मृति सूक्ति की तरह लेकर त्याग दी। इस साँप का व्यक्तित्व उदारवाद के ज्यादा करीब पडता था। इसकी जीभ जब बाहर आती तो जैसे कहती थी-
‘तुम नहीं बोलोगे
बोलेंगे दो
दो
जीभ के दो-दो
मखमली तीखे सिरे
प्रेम में मौन।’
लॉन का हरापन उसके लिए आश्वस्ति थी। वह निश्चिंतता से रेंगती देह को रह-रहकर घास के बीच सरसरा लेता। पत्थर पर बैठे-बैठे हरेपन से सरसराने का रिश्ता कायम रखते हुए उसे जब कोई भावभीनी शब्दावली व्यक्त करना होती वह दुगुने वेग से झूम जाता था। फन? कुछ-कुछ था। पर लगता था कि वह मुँह जमीन के करीब ले जाना ज्यादा यथार्थवादी मानता रहा होगा। रेंगते वक्त भी, वह सर्पमुख ही होता है जो जरा उठ जाता है।
मैंने कहा-तुम क्या सोचती हो? हरी घास के रंग में उसका रंग जाना...।
उसने कहा-तुम क्या सोचते हो? उसके हरे रंग की देह का ही लॉन हो जाना...।
मैंने हिसाब लगाया-दो मीटर के हिसाब से इस लॉन में कितने साँप बनेंगे?
इस बीच साँप ने एक मेंढक को दबोच लिया। मुझे हिसाब रोकना पडा। उसने कहा, पर्यावरण विश्व की पहली चिंता है। हमें हरेपन को बचाना है। मैंने पूछा, कितने साँपों की जरूरत होगी? उसने बताया, ‘हरे कच्च हों। झूमते हों। दो मीटर की साँप की हैसियत हो...तो कोई लॉन भर काफी होंगे।’
इस पर साँप ने एक और को दबोच लिया।
निगले हुए मेंढक और सुस्त साँप का रिश्ता कभी-कभी फंसी हुई पूँजी जैसा हो जाता है। हरे साँप को इसमें दिलचस्पी नहीं थी। वह दबोचता और छोडता था, फिर दबोचता ताकि फिर छोड सके। हरेपन के धंधे में जैसे शेयरों का मूड समझने का खेल कर रहा हो।वह मस्ता रहा था ताकि लॉन और भी ‘हरियाला बन्ना’ हो सके। मेरे साथ बैठी हुई वह सोच रही थी, जीव-विज्ञान की ‘फूड चेन’ कब पूरी होगी? चूहे को साँप, साँप को गरुड या हिरन को बाघ, बाघ को आदमी कब मिलेगा?
हम दोनों के बीच अब एक सांप था। मेरे हाथों में हिसाब था। उसकी आँखों में एक हरी-भरी चमक थी। लॉन, विश्व प्रकृति निधि हो रहा था। अन्तरराष्ट्रीय पर्यावरण प्रेम अभियान जिनेवा वगैरह से होता हुआ लॉन में संभावनाएं तलाश रहा था। मैंने मन ही मन एक कोना काटा और घास-पृष्ठ भूमि में उस पर संभव सर्प-पीठों का स्थान निश्चित किया।
हरे सर्प को पर्यावरण की बहुत चिंता थी। झाडियों के पार भिन-भिन करते ढेर को उसने देखा। पता नहीं, साँप भारतीय संस्कृति में पूजे जाते हैं, लेकिन भारतीय सांस्कृतिक लक्षण प्रकट करते हुए पान खाते हैं या नहीं खाते? मुझे ऐसा लगा कि वह पान खा सकता था। एक सजीले कमरे की खिडकी से बाहर, प्रेम के शासकीय छायावाद से आप्लावित कोई आईएएस कवित्व का प्रेम-अधिकारी, गंदगी पर हिकारत फेंके तो कैसे फेंके? वो ऐसे फेंके कि जैसे पान-पिच्च! लेकिन पान का पत्ता मौलिक रूप में हरा होता है। किसी भी हरेपन को नष्ट करने के लिए उजले-सफेद चूने को उंगली, कुछ कत्थे के हाथ, कुछ-एक पीले-लाल-काले मसाले जरूरी होते हैं। हरा नष्ट होता है, लजीज स्वाद दे जाता है। हमारा साँप पर्यावरण-प्रेमी था, हरा था और हरा खाकर लाल थूकता नहीं था।
शुरू में साँप हमारे बीच था, तब उसका मुँह मेरी तरफ था और पूँछ उसकी तरफ। अब साँप ने दिशा बदल ली। उसके होने का अर्थ था, हमारी आंखों, दिलों और विचारों के बीच उसका निरंतर रेंगना। साँप निरंतर दिशाएं बदलता हुआ रेंगने लगा। जन्तु शास्त्र में साँप के रेंगने, बीन पर झूमने, दूध पीने, फन काढने, शताब्दी आयु के बाद मनचाहा रूप धारण करने आदि पर काफी विचार हुआ है। इस विचार का इतना ही फर्क पडा कि साँप को दूध पिलाने का मुहावरा राजनीति में चला गया और उसकी तस्करी अन्तरराष्ट्रीय हो गई। बाकी बची पंचमी मनाने और नागिन-नगीना पर मुग्ध हो जाने की प्रथा हमें अभी भी जबर्दस्त नैतिक समर्थन देती रहती है। इसी नैतिक शक्ति के चलते मैंने हर साँप की गिजगिजाती लंबाई पर प्रकाशमान पर्यावरण को थिगाया।
वह बोली, ‘हरे साँप कितने प्रेमिल होते हैं। जी चाहता है यहाँ से वहाँ तक हरे साँप बिछा दूँ।’
मैंने महसूस किया कि वह मुझमें साँप देखने लगी है। प्रेमिल और हरा...कई के साथ कुंडली डाल बैठा हुआ। रजिस्टर्ड संस्था/अन्तरराष्ट्रीय फंड/ताडी और बीडी के मुद्दे पर भी गर्दन उतार कर थाने में जमा करने पहुँचने वाले अधनंगे जन-गण-मन और नदी के ओर-छोर जंगल। पर्यावरण की भट्टी पर अन्तरराष्ट्रीय ‘कच्ची’ उतारने लायक महुए भरे बोरे हों जैसे! उन बोरों पर बैठे हरे-हरे कुंडली डाले साँप!!
मैंने कहा, ‘निश्चित ही हरे धंधे में काफी हरा ही हरा है। पर तुम लॉन में बैठी हो। यहां अधिक से अधिक हरे साँप का एकल कविता पाठ हो सकता है। ज्यादा हुआ तो एक ध्वनि-प्रकाश कार्यक्रम कराना होगा। एन.जी.ओ. चलाना हो या कविता करना हो, कई बिल चाहिए जिनमें साँप सुगमतापूर्वक आ-जा सकें।’
इस दौरान साँप का व्यक्तित्व और निखर गया। चिडियाएं चाँव-चाँव करने लगीं। साँप को देखकर हमेशा चिडियाएँ सामूहिक शोर मचाती हैं। शोर से साँप समारोहित अनुभव करता है। भयाक्रान्त स्वर साँप को स्वागत गीत प्रतीत होते हैं। जिन्होंने चिडियाओं को आंदोलन करते देखा है, वे जानते हैं कि उन्हें चिडीमारों को भी ऐसे ज्ञापन देने जाना पडता है, जैसे जान की खातिर नर्मदा में जल समाधि का अल्टीमेटम दे रही हों। जंगल, चिडियाओं के गीत से भले ही जंगल लगते हों, साँप के बिना वे कुछ नहीं होते।
मुझे हैरत सिर्फ इस बात से हुई कि साँप हरा था, लॉन हरा था, सब कुछ हरा था, फिर भी चिडियाएँ साँप को हरियाली में शामिल क्यों नहीं मान रही थीं? और यह भी कि, एक हरा साँप अपने हरेपन के मेल-मिलाप के बावजूद, अलग से साँप की तरह कैसे पहचान लिया गया? जवाब आया, चिडियाएं राजनीति में फँस भले ही जाती हों फर्क करना हो तो एस्ट्रो टर्फ और हरी घास पर भी गलती नहीं करतीं।
रेंगता साँप रुक गया। तना और तना। फुफकारा और चिडिया मार दी।
मरी हुई चिडिया लॉन में पडी थी।
उसने कहा, ‘हरा है?’
मैंने कहा, ‘साँप नहीं है।’
सुन्दर सी क्यारी के खामोश से कोने से हुआ हस्तक्षेप, पत्थर की चपटी सतह पर चिडिया की तरह पडा था।
हरा साँप उसकी निगाहों में मर गया था।
वह करीब आई और पर्यावरण पर, एक गिजगिजाते साँप की कविता सी बाँहों में झूल गई। मैंने हाथ झटक दिए। उसे होश आया। चिडिया को दोनों ने देखा। आँखें मिलीं। एकदम साफ-सुथरी, स्पष्ट, गहरी और दिल मारने वाली ‘जेनुइन उदासी’।
शरीफों की चाह पूरी हुई।
हम एक-दूसरे की खूबसूरत जल-समाधि सी उदासी में डूब गए।
Tuesday, July 29, 2008
मेरी क्यों नहीं कटी?
यह एक ‘बॉक्स न्यूज’ थी।
कुछ लोकल किस्म के जेबकतरे लम्बे चेहरे लटकाए-लटकाए घूम रहे हैं कि उस जेब को उन्होंने धन्य क्यों नहीं किया? एक-दो जेबकतरे, जिन्हें भीड और एकांत में समान रूप से हाथ साफ करने का राजनीतिक अनुभव है, यह दावा करते हुए भी मिले कि अहमदाबाद में, जहाँ यह घटना घटी, उन्हीं के चेले सक्रिय हैं। इसलिए, जरूर उनके किसी चेले ने ही यह उल्लेखनीय कार्य संपन्न किया है। उनमें से एक ने कहा कि ब्लेड का इस्तेमाल इस काम में नहीं किया गया, इसलिए यह उसी के सिखाये हुए सुशिष्य का कारनामा रहा होगा। दूसरे ने दावा किया कि जेब पर एक खास किस्म का ‘कट’ था। ऐसा कट उसी ने ईजाद किया है। उसके तमाम विद्यार्थी राजनीतिक लीडरों के जेब काटते वक्त यह ‘कट’ छोड जाते हैं ताकि अगले चुनाव में सुभीते से सम्फ करने की गुंजाइश छोडी जा सके।
एक अन्य अनुभवी ने कहा कि जिनकी जेब कटी है वे जिस दर्जी के हाथ का कुर्ता-पाजामा पहनते हैं, उसके सारे ‘डिटेल्स’ उसके पास हैं। यदि उस दर्जी का कुर्ता-स्टाइल देखें तो पता लगेगा कि वह ‘कलियाँ’ कुछ अलग तरीके से लगाता है। जेब उसमें गहरी होती है और वह निचले हिस्से से ही काटी जा सकती है। यह लंबी अँगुलियों की बजाय छोटी और उस्तरामार महारथ वाली कलाइयों का ही कौशल है कि उनकी जेब पर हाथ साफ किया जा सका। चूँकि उन्होंने ही गुजरात से ही रथयात्रा प्रारंभ की थी, इसलिए गुजरात में ही उनकी जेब से रुपये मार कर वह जेबकतरा धन्य हो गया है। उसने इस पवित्र मुद्रा को पाकर अपनी पीढियाँ तार ली हैं। वे दो सौ रुपये नहीं, पुण्य का मनीप्लांट हैं, जिसके बारे में कहा जाता है कि वह चुराये जाने पर ही फलता-फूलता है और बेडरूम के अंधेरे में ही सिर्फ पानी भरी बोतलों में भी हर-हराता है।
मेरी शंका थी कि उनकी जेब में दो सौ रुपये क्यों थे? वे कई हजार क्यों नहीं थे? क्या वे एक सौ नहीं हो सकते थे? अंतिम दर्शन के वक्त आदमी जेब का ख्याल क्यों नहीं रखता? क्या इस घटना के बाद बनवाए कुर्तों में उन्होंने जेब रखवाना बंद कर दिया होगा? क्या वे दो सौ रुपये, वे किसी मंदिर में चढाने के लिए साथ लाये होंगे अथवा उनका जेब खर्च था, जिसे वे सादगीपूर्ण जीवन की वजह से खर्च ही नहीं कर पाये? यह एक प्रश्न अलग है कि, क्या राजनेता जेब खर्च रखते हैं?
जेबकतरे ने अंतिम दर्शन का ही अवसर क्यों चुना? उसने रथयात्रा या चुनाव सभा का समय क्यों नहीं चुना? क्या जेबकतरा उस भीड का हिस्सा था? चूंकि भीड श्रद्धालु थी, तो सहज प्रश्न यह उठता है कि जेबकतरे की आत्मा की श्रद्धा, जीवन की नश्वरता की ओर न जाते हुए जेब की मुद्रा पर ही क्यों गई? क्या श्रद्धा का जेब से कोई सीधा सम्बन्ध है? क्या जेब न होती तो उनकी तरफ जेबकतरे का मन न खिंचा होगा? क्या उनके प्रति श्रद्धा की वजह से उसने उनकी उसी जेब पर हाथ डालना उचित समझा? लेकिन, उसमें कुछ नहीं होता तो जेबकतरा क्या जेब का टुकडा ही स्मृति चिह्न की तरह सहेज कर घर ले जाता?
एक पवित्र कल्पना यह है कि जेब में से पार्टी का मेनिफेस्टो हाथ लगता तो क्या जेबकतरा रामराज्य का संदेशवाहक हो जाता? ऐसा होता है तो किसी कांग्रेसी लीडर की जेब पर हाथ साफ कर कोई जेब कतरा ‘सेक्युलर’ नहीं बन सकता था? या फिर पार्टी की युवा शाखा के नायक के रूप में नागपुर के किसी प्लेटफार्म पर लूटपाट की संस्कृति का जनप्रिय संस्करण पैदा करते हुए उसकी आत्मा का विरेचन ही हो जाता? क्या वामपंथी की जेब काटकर कोई जेबकतरा वामपंथी भी बन सकता है?
पहली बात यह है कि जेब और लीडर के बीच क्या संबंध हैं? क्या यह सही नहीं है कि जेब उसी की कट सकती है, जिसकी जेब हो? कल से आप जननेता के साथ जेब लगाए-लगाए घूमेंगे। और चाहें कि जेब कट जाए, तो जेबकतरा आपकी जेब काटना चाहेगा कि नहीं? जब यह स्थिति पैदा हो जाए तो क्या आप अपनी जेबें उस मुख्य जेब से जोडकर जेब कटने का कीर्तिलाभ पाने की कोशिश नहीं करेंगे?
क्या जेबें कटने के लिये ही बनी हैं? क्या हर जेब ‘कटनशीलता’ की अधिकारी होती है? जो जेब कटती नहीं, क्या वह पवित्र नहीं होती? अगर आडवाणीजी की जेब में दो सौ रुपए हैं और चन्द्रास्वामी की जेब में दो हजार डॉलर हैं, तो जेबकतरा पहले किसकी जेब काटेगा? कुछ लोगों के कुर्ते इलाहाबाद में हैं, लेकिन जेबें स्विट्जरलैंड में, उनके लिये जेबकतरों की कार्य-योजना क्या है? जिनकी मलमल धनबाद की है, दर्जी भौंडसी के, उनकी जेब के बारे में वे क्या सोचते हैं?
क्या जेबकतरे वही हैं, जो किसी पार्टी के बाकायदा चवन्नी मेम्बर हैं? क्या राजनीतिक पार्टियों में बगैर संगठनात्मक चुनावों के, जेबकतरों का प्रवेश वर्जित है? नामांकन की राष्ट्रीय प्रणाली और जेब के बीच क्या रिश्ते हैं? अगर आपकी जेब में दो सौ रुपये होते और आप आडवाणीजी नहीं होते तो आपका क्या होता? अगर आप की जेब में दो सौ रुपये नहीं होते और आप किसी कम्युनिस्ट पार्टी के भी नेता न होते तो क्या होता?
क्या आपको पता है कि थूकने को उल्लेखनीय बनाने के लिए थूकदान नहीं, उपयुक्त चेहरा चाहिए? क्या आप जानते हैं कि ईंटें, जब जेब में चली जाती हैं, तो पत्थरों में अगली कार्यवाही करने के लिए सेमिनार कब तय होता है? क्या जेबकतरा आपका दोस्त हो जाए तो लीडरों की जेब आपकी बेटी के लिए चॉकलेट और स्कूल की फीस में बदल सकती है?
माना कि आडवाणीजी की जेब, बाबरी मस्जिद की जेब, अयोध्या की जेब, बुखारी और शहाबुद्दीन की जेब, सरकार के लोगों की जेब और सरकार के विरोधियों की जेब पर, प्रति जेब दो सौ रुपये कि हिसाब से एक जेबकतरे द्वारा हाथ साफ किया गया तो उसने कुल कितनी धर्म निरपेक्ष मुद्राएं कमाईं?
क्या धर्म निरपेक्षता साबित करने के लिए राजनीतिक जेबों का होना इतना जरूरी है?
अब असली प्रश्न यह है कि जिस भीड में उनकी जेब कटी, उस भीड में क्या एक ही जेबकतरा था और एक ही जेब थी? या कई जेबकतरे थे और एक ही जेब थी? यों भीड का मूल उद्देश्य उनकी जेब से कोई संबंध नहीं रखता, इसलिए हमें यह प्रसंग यहीं छोड देना चाहिए। क्योंकि, जेबकतरा, जेबकतरा है और वे सिर्फ वे। वह सिर्फ जेब काटता है, आदमी नहीं देखता। जिसकी जेब सामने आई, जमी, उसी की जेब साफ कर दी।
अगर भीड को पता चल जाता कि उसके नायक की जेब किसने काटी है, तो क्या जेबकतरा वहीं पिटकर मारा न जाता? या वह जेबकतरा दो सौ रुपये के मुकाबले ‘‘लखटकिया’’ पिटाई के बाद ही जान पाता कि वे कौन हैं, उनकी जेब और उनके नोट कैसे होते हैं?
मैंने सोचा एक जेबकतरा होना आसान है, लेकिन एक नेता होना मुश्किल, क्योंकि जेबकतरा चाहे कितना कुशल हो, राजनीतिज्ञ की जेब पर हाथ डाले बगैर बॉक्स न्यूज के काबिल नहीं होता। उनकी जेब तो बस प्रतीकात्मक है। अगर अटल बिहारी, सुब्रमण्यम स्वामी या वी.पी. सिंह या शहाबुद्दीन की जेब भी कटती तो खबर ‘‘बॉक्स’’ में ही जाती। वजह? वजह साफ है, जेबकतरा चालू प्राणी है और राजनेता खास।
एक बार मैंने कोशिश की थी कि किसी श्रद्धालु भीड में घुस जाऊं और श्रद्धा छोडकर जेबे टटोलूं। पर मैंने पाया कि मैं अपने जैसे लोगों के कई किलोमीटर लम्बे जत्थे में हाथ मार रहा था, जबकि जेबों वाले तो मंदिर के पिछले हिस्से में भगवान के डायरेक्ट ‘‘विशेष दर्शन’’ ले रहे थे। पता लगा जहाँ मारामारी कर रहा था वो उसी मूर्ति के जनता-दर्शन की अन्तहीन लाइन थी।
तो इससे क्या सिद्ध हुआ संतों? कि सिर्फ... सिर्फ श्रद्धा से काम नहीं चलता। कि जेब न हो तो भगवान भी हमें ‘जनता खाते’ में डाल देते हैं। इसी फिलासफी के चलते जेबकतरे ने भीड में से श्रद्धा नहीं, जेब चुनी।
कहने में यह कोई नई बात नहीं लगती। उनकी जेब थी, अगली बार से वे जेब साथ लेकर नहीं चला करेंगे तब आप क्या कर लेंगे? क्या जेबकतरे हडताल करेंगे कि साहब, हमको वही जेब होना? कुछ लोगों का ख्याल है कि ऐसे जांबाज जेबकतरों की जनता को बहुत जरूरत है, जो सीधे-सीधे जेबधारियों पर अपनी ‘च्वॉइस’ के हिसाब से दावा जता सकें।
इस रचना के शीर्षक में मैंने एक हल्का-फुल्का सवाल उठाया है, उनकी जेब कटी, मेरी क्यों नहीं कटी? मैं विनम्रतापूर्वक यह रहस्योद्घाटन करना चाहूंगा कि मेरे पास कभी जेब रही ही नहीं है। मैंने अपने जेब कतरने के कौशल का प्रोपेगंडा करने के लिए यह शीर्षक टिकाया है। असल में मैंने सभी पार्टियों के सभी नामचीन लीडरों की जेब पर हाथ ट्राई किया था, इन महोदय ने जेब जरा आजाद छोड दी, इसीलिए हाथ चल गया। वे दो सौ रुपये मैं हाथ में लिये घूम रहा हूँ, क्योंकि जेब तो है नहीं, जहां इन्हें रखा जा सके। अब इन रुपयों से काला हांडी की तरफ जाऊँ या अयोध्या? या मौजूदा सरकार के स्थायित्व की चर्चा में खर्च डालूँ। वैसे आप लोग अगर कहेंगे तो इन रुपयों की बोली लगाकर बेच दूंगा। आखिर जिन-जिन जेबों से होकर आये हैं, वह हमारी संस्कृति की अमूल्य निधि है। संस्कृति-प्रेमी इसके एक-एक चिन्दे पर लड मरेंगे।
पुनश्चः किसी ने कहा है कि उन्होंने दिल्ली में उस बॉक्स न्यूज का खंडन किया, जो उनकी जेब से संबंधित था। उनके कहे मुताबिक उनकी जेब नहीं कटी।
खंडन अपनी जगह सही है और खबर अपनी जगह। वह जेब उनकी थी और नहीं भी। अगर एक ही रात में एक ही जगह से सभी पार्टियों के नेताओं की जेबें कट जाएं, तो भी निष्कर्ष यही होगा कि उनकी जेबें नहीं कटीं। क्योंकि, जेबें तो वे हमारी लेकर चलते हैं। सुहाग भी हमारा और स्यापा भी। उनकी तो, कटी तो भी खबर पक्की, नहीं कटी तो खबर डबल पक्की।
पुनः पुनश्चः आडवाणीजी के साथ घटी इस घटना के कई साल बाद कांग्रेस ने इसी गुजरात में गाँधी की दांडी यात्रा की स्वर्ण जयंती मनाई। वहाँ उनके भी कुछ नेताओं की जेब साफ हो गई।निष्कर्ष अंततः कुछ लोगों की जेबें होती हैं, कुछ जेबकतरे होते हैं। देश में कई-कई साल बाद भी दोनों के रिश्ते एक से रहते हैं।
जड हे! जड हे!! जड हे!!!
प्रचार था कि उनका नाम दलित बंधु दुख भंजन नाथ नहीं है। जब वे बच्चे थे तब मालगाडी के डिब्बों से कोयला चुराते थे। बाबू ने एक बार पकड लिया। पीठ पर डुक्का पडा। तब इन्होंने बाबू को संकेत में कहा-डब्बा बब्बा डुक्का नॉट! यानी डिब्बे के पीछे चलो बाबू, डुक्का न दो। बाबू समझ गया और चोरी के प्रथमांश को अर्पित करने का बीज पहली बार वहीं पडा। इलाके में काम करना हो तो ‘डब्बा बब्बा डुक्का नॉट’ से बडा कोई मंतर नहीं बना। उनका नाम डीबीडीएन इसी मंतर पर पडा। कहते तो यह भी हैं कि उनके पिताजी ने दीनबंधु दीनानाथ के नाम पर उन्हें नाम दिया था पर जब दलित आंदोलन ने जोर पकडा और उधर एक फिल्म आई जिसमें खलनायक सदाशिव अमरापुरकर का नाम डीबीडीएन पाया गया तो वे तेजी से भाग्य का लेखा समझ गए। यों कथाकार-कवि-समाजकर्मी डीबीडीएन का पूरा नाम हुआ-दलित बंधु दुखभंजन नाथ। अलबत्ता मालगाडी के डिब्बे, बब्बे और डुक्के उन्हें अभी भी उतने ही सताते हैं। आजकल वे कवि हैं।
तो, ऐसा हमारा कवि डीबीडीएन आगे बढा। रीगल के पोस्टर से टांगें बाहर आ रही थीं। पीछे के तीन मंजिले कॉफी हाउस में न जाकर कवि हनुमान मंदिर गया। कुछ भक्तिनों को देखा। मनन किया। पैंतालीस डिग्री पर आंखें उठाईं और एक गहरी सांस ली-लिखने को क्या बचा रह गया है? तभी एक कुत्ता कांय-कांय करता भाग खडा हुआ।
कवि की आत्मा दरियागंज हो गई, मन प्राग हो गया, दिमाग आयोवा और आंखें टेम्स!
सडक दिल्ली की, संकट कवि का। दिल्ली के ठगों में ठगा-सा खडा कवि। लगे कि जैसे कवि की कटी जेब से गिरी स्त्री, बचा विमर्श। वह अर्श, यह फर्श! म्युनिसिपल कॉरपोरेशन की सीवर लाइन में इस बीच कितना मैला बह गया है! दुनिया बदल गई। कवि अपनी उम्र और कविताओं का आंकडा मिलाकर देखने लगा। उसे अचानक अहसास हुआ कि पिछले अनेक सालों में उसने 16॰ अध्यक्षताएं कीं, 1॰॰1 संस्मरण सुनाए, 15॰॰ बहसें कीं, लगभग 9॰ बार श्लील-अश्लील हुआ, कम-से-कम 1॰ बार गाली-गलौज का स्तर उठाकर राष्ट्रीय किया। अरे दलित बंधु दुखभंजन नाथ, फिर भी ग्रासरूट लेवल पर फर्क न पडा। ओह डब्बा बब्बा डुक्का नॉट-तू करोडपति भी न बना। कुलपति भी नहीं बना। कुलशील के स्तर पर रैडिकल होते हुए भी नामाकूल डीबीडीएन, तू असली दुनिया की क्रांति में कुछ न कर सका, तुझसे देश के अंतिम आदमी को क्या मिला?
हाय भारत देश! हाय इंडिया गेट! अरे निजामुद्दीन पुल की हवाओ! ओय दारूकुट्टे संपादकों, ओय-होय शांतिर मीडिया सेवको! ओह धौला कुआं के ट्रैफिक पुलिस वालों! सुनों बोट क्लब के धरानार्थियों! इंडिया इंटरनेशनल सेंटर की सडक की चिकनाइयों! सुनो-यह कवि अब नहीं रुकेगा। वह जडों की ओर लौट रहा है।
कवि को बोधप्राप्ति हो गई।
वह बीकानेर हाउस से डीलक्स बस में बैठकर जडों की ओर लौट गया।
कवि की जडें पूरी धरती पर होती हैं। मगर वह जब उनकी तरफ लौटना चाहे तो चयन के विकल्पों का प्रावधान है।
उसकी जडें नायला में थीं। वही जयपुर के पास वाला नायला। मतलब वही-अहा ग्राम्य जीवन भी क्या है, हैंडपंप में पानी नहीं आता, सडक सन् साठ की फिल्मों की प्रेरणा लेकर सौंदर्य टिकाए चली आ रही है। कई लोकल अखबारों के स्ट्रिंगरों के लिए महीने का मामूली बिल बनाने में मदद करने का पूरा इंतजाम। सडक, स्कूल वगैरह पर कई सालों से लिख रहे हैं, आगे भी लिखते रहेंगे। ईश्वर ने अगर चाहा तो अखबार वालों की अगली पीढियां भी इन्हीं समाचारों से कमा खाएंगी।
पर, डीबीडीएन के लिए नायला महज नायला नहीं था। वह कवि की वैश्विक दृष्टि में ग्लोबलाइजेशन की पहली प्रयोगशाला थी। यह वही गांव था जिसे अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन को दिखाने के लिए चुना गया था।
कवि ने क्लिंटन के फर्टिलाइजर से सींची जा रही जड की ओर हसरत भरी निगाहों से देखा। वह भी मोनिका और हिलेरी की कथाओं का निष्ठावान वाचक था। वह भी केसरिया बालम होना जानता था। वह जडों के हरेपन में विश्व कुटुंब का प्रवाह देखना चाहता था। वह लगना चाहता था-सामंती इतिहास के प्रदेश में जन-जडों को देखता कवि! वह जडों का सुख उठाना चाहता था, दुख पर प्रयोग करना चाहता था। उसकी प्रयोगधर्मिता विख्यात थी। वह लडकियों से पिटने पर व्यभिचार का शास्त्र लिख सकता था। पिता पकड में आ जाए तो उसे कहानी बनाकर बेच सकता था। शौचालय में बनाई पेंसिल की आकृतियों को कला के नमूनों में बदलकर श्लील-अश्लील की बहस खडी करवा सकता था। उसे कुछ करना ही था। उसे जडें चाहिए थीं।
क्या आपको पता है कि कोई भी अपनी जडों को कैसे देख सकता है? अपनी जडें होती क्या हैं? क्या आदमी की जड पेड की जड की तरह ही होती है? अधिकांश कवियों की जड गांव में ही क्यों होती हें? कवि की जड शेष मनुष्यों की जड से भिन्न होती है? तो, डीबीडीएन की जड और किसी अन्य रचनाकार की जडें भी कुछ भिन्न होती होंगी। ‘डब्बा बब्बा डुक्का नॉट’ की जडें कुछ खास होती होंगी। क्या गारंटी है कि कवि जडों की ओर लौटेगा तो अपनी ही जडों पर पहुंचेगा, किसी और की जड को अपनी जड समझकर उसी पर लटूम नहीं जाएगा? जडों पर कोई बिल्ला, बैनर, पट्टी या निशान तो होता होगा।
यह संशय में डालने वाला मामला है। कवि एक पल ठिठकता है, फिर खिल जाता है।
कवि संशय को शक्ति में बदलना जानता है। चिंता न करें, वह जडों पर आठ लंबी कविताएं लिख चुका है। कविताएं उसकी कुदाल हैं। मिट्टी खोदकर जडों तक पहुंचने का इंतजाम है उसके पास। ज्यादा जरूरत पडी तो दो-तीन कविताएं और लिख देगा। कुदालों की संख्या बढ जाएगी।
जडों की ओर लौटने के लिए वह नायला की जमीन को छूकर देखने लगा। बदरपुर से थोडी अलग है। यमुना पुश्ते से भी थोडी अलग है। ओह, इंदौर के रेसकोर्स रोड और मुंबई की चौपाटी से भी अलग है। जब सबसे अलग है तो अद्वितीय है। अद्वितीयता तो डीबीडीएन की ही खासियत है। चलो, शांति हुई। एक लक्षण पकड में आया, अब वह निबट लेगा।
कवि अपनी अद्वितीयता पर सोचने लगा। ‘मों’ सम कौन कुटिल, खल, कामी? वह दलित है क्योंकि उसने प्रमाण पत्र बनवा रखा है। वह ब्राह्मण है क्योंकि उसके नाम में वह गंध आती है। वह ठाकुर है क्योंकि उसने कई वध किए हैं। वह स्त्रियों का उन्नायक है क्योंकि सर्वाधिक अश्लील कथाएं रचने का उस पर आरोप है। वह अकेला है, अपनी तरह का अकेला, जो दया पवार के ‘बलूत’ से पंडित विद्यानिवास मिश्र के फलाहार तक निर्भय यात्रा करता है। आह, वह चंडूखाने से लेकर अंसारी रोड तक एक-सा सनसनाता तीर! वह कुक्कड की टांगों से लेकर लोकार्पण के फीतों तक पवित्रतम निमित्त! चित्त और वित्त की यह अद्वितीयता उसे मीठी बेहोशी देने लगी। वह नीचे बैठ गया।
जहां बैठा था, वे पंचायत भवननुमा जगह पर बनी सीढियां थीं। मीठी बेहोशी में उसने खेत-खलिहान, सिटी बसें, गिद्ध, कौए, कलाली, किताबें वगैरह देखीं। भागते-चलते बच्चे देखे। नाचता हुआ क्लिंटन देखा। उस पर फूल गिरे थे। घूंघट में गांव की औरतें उसके आसपास घूमर ले रही थीं। नायला जगर-मगर कर रहा था। उसी जगर-मगर में क्लिंटन ने एक कम्प्यूटर दिया।
शॉट फ्रीज हो गया।
डीबीडीएन की तंद्रा टूट गई। सामने एक बकरी मुंह चला रही थी। पीछे चार भले लोग बकरी पर टूट पडने के अंदाज में! बकरी ने संवेदनशीलता के आगार को पहचान लिया। कवि के पीछे शरण ली।
कवि और भले लोगों के बीच संवाद आरंभ हुआ।
‘आप कौन हैं?’’
‘मैं जडों की तलाश में आया हूं।’’
‘‘किसकी जडें चाहिए-शकरकंद की, मूली की या बरगद की?’’
‘‘अपनी जडें।’’
‘‘तो जाओ, खेत में उग जाओ।’’
कवि उनकी हालत पर हंसा। पंचायत में देश की जडें होती हैं, पंचायत की सीढियों पर बैठा कवि अपनी जडों की ओर लौटकर देश को आगे बढाना चाहता था। ऐसे गंभीर काम को वे कमअक्ल कैसे समझ सकते थे, जो एक बकरी के पीछे पडे थे।
बकरी ने कवि को देखा। कवि ने बकरी को ऐसे, जैसे आश्वासन दिया हो कि अगली बार तुझ पर पांच कविताएं लिखूंगा। अभी जरा जड मूर्खों से निबट लूं, अपनी जडें तलाश लूं।
‘‘तुम्हें जडों के बारे में कुछ नहीं पता। जडों की ओर लौटना बडा गंभीर काम है। बीस साल रेडियो, टीवी, अखबार, पत्रिका और व्याख्यान के लंबे व्यायाम के बाद मुझे समझ में आया कि जडों की ओर लौटना चाहिए। तुम इस पचडे में मत पडो। तुम तो इतना भर बताओ कि बकरी के पीछे क्यों पडे हो?’’ कवि ने बिल्कुल इस तरह चेहरा बनाया जैसे प्रसार भारती का फोकट अनुबंध पकडा रहा हो या कमीशंड कार्यक्रम का सार किसी घुटे हुए संपादक से शेयर कर रहा हो।
जाहिर है, वे चारों न घुटे हुए संपादक थे, न प्रोग्राम पास करने वाले अफसर! वे गांव के लोग थे। उनका लक्ष्य बकरी थी। वे जड-बहस में नहीं पडना चाहते थे।
‘‘पंचायत छोडो। थोडा-सा हट जाओ। ये बकरी उस कम्प्यूटर का प्लग चबा गई है जो बिल क्लिंटन साहब के यहां आने के मौके पर हमें मिला था। हम इसे ठीक करना चाहते हैं।’’
बकरी मिमियाई।
कवि गरज उठा, ‘‘इसने कम्प्यूटर का प्लग चबाया है। जब कम्प्यूटर खुला पडा था, तब तुम क्या कर रहे थे?’’
‘‘जब से कम्प्यूटर आया, तब से खुला पडा था। वह एक जादुई डिब्बा था जो धूल खाता, हमें डराता था। बिजली नहीं थी। हमारे पास अलग से कोई मेज नहीं थी, फिर भी हमने कम्प्यूटर के लिए जगह निकाली। हम शपथपूर्वक कहना चाहते हैं कि हैंडपंप सूखा पडा है, वह देखते-देखते हमने बकरी को जरा-सा हडकाया था। यह उछल भागी और कम्प्यूटर तक जा पहुंची। वहीं उसने प्लग चबा लिया। हम इसके पेट से वह प्लग निकालकर कम्प्यूटर में वापस लगाना चाहते हैं। वरना क्लिंटन साहब के प्रति यह गुनाह हो जाएगा। हम क्रांति और कम्प्यूटर तक जाते-जाते चोरी-गुमशुदगी के आरोप में मारे जाएंगे।’’
कवि की गरज शांत हो गई। उन्होंने छंटे हुए सॉफ्टवेयर-हार्डवेयर ज्ञाता की तरह बकरी की गरदन पर हाथ धरा। उसकी आंखों में आंखें डालीं। क्लिंटन की भांति मुस्कराए, तार से तार मिल गए। बकरी की आंखें स्क्रीन में बदल गईं। सारा डेटा खुल पडा था। पहली फाइल में जडें ही जडें थीं वह जडें जिनकी तरफ लौटने के लिए कवि बेताब होकर दिल्ली छोड आया था।
बकरी के कान माउस हो गए। पीठ की-बोर्ड में बदल गई, मुंह से प्रिंट निकालने लगे।
यह जादुई यथार्थवाद था और इसमें मौलिकता का स्तर इतना ऊंचा था कि किसी आचार्य से मदद लेने की जरूरत नहीं थी। स्थापनाएं साफ थीं। मोनिका का वालपेपर स्क्रीन को मोहक बना रहा था। बीच की झपकी में एक स्क्रीन सेवर चला तो वह जडों की सूक्ष्म रचना से बना निकला। गांव की को-ऑपरेटिव दूध सोसायटी, महिला उत्थान समिति, गिट्टी-सडक, गड्ढे आदि से विहीन रेशमी सडक और क्लिंटन की टी शर्ट भी खुली। एक फाइल में ‘प्रेजेंटेशन’ बना निकला, जो बताता था कि नायला विश्व का पहला कम्प्यूटर ग्राम बनकर अपनी जडों से कैसे आकाश छूने जा रहा है। पे*जेंटेशन में हर बार एक ग्राफिक आता था जिसमें पर्यटन मंत्री घूमर लेता दिखता था। संगीत भी था, केसरिया बालम पधारो नी म्हारे देस! नायला एकदम ग्लोबल ग्राम बन जाता था और देहाती, क्लिंटन का टी शर्ट पहनकर हैंडपंप से टैंकर के टैंकर पानी भरते थे।
बकरी की पीठ पर उंगलियां चल रही थीं, नई-नई चीजें खुल रही थीं। मुंह से प्रिंट पर प्रिंट गिर रहे थे। कवि कम्प्यूटर को इंटरनेट से जोडकर साइबर स्पेस में जाना चाहता था कि कनेक्शन कट गया।
कवि की लय टूट गई। जडों से चल रहा रास छूट गया। सारा उपक्रम थम गया।
सामने वही देहाती खडे थे। बकरी उछलकर सूखे हैंडपंप की ओर दौड पडी थी।
कवि अब रुक नहीं सकता था। डीबीडीएन को कर्तव्य पुकार रहा था। जडों के पास जाकर वह उन्हें खोना नहीं चाहता था। तो भागा कवि आगे-आगे। देहाती उसके पीछे। नीचे धूल-मिट्टी-गड्ढे, ऊपर तीखी धूप।
देहाती चिल्ला रहे थे-बकरी चोर! पकडो!!
कवि कह रहा था-आ लौट आ, जडों की ओर आ, चल तुझे साइबर स्पेस ले चलूं!
चोर, जडें और साइबर स्पेस!
समां बंध गया, माहौल बन गया!!
इस घटना के अंत के कई संस्करण प्रचलित हैं। उनमें से एक यह है कि देहातियों ने कवि को बहुत पीटा, जिस पर उसने एक लंबी कविता लिखी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सफल आंदोलन का नेतृत्व किया।
दूसरा संस्करण यह है कि देहाती समझ गए कि यह कोई पहुंचा हुआ पुरुष है, जो कम्प्यूटर क्रांति करने आया है। उन्होंने उसे बकरी दान में दे दी। बकरी का दूध पी-पीकर कवि काफी मोटा हुआ और कालांतर में उसने जडों की ओर लौटने के अभियान को विराट स्वरूप दिया। हजारों बकरियों के साथ वह सुखपूर्वक कहीं अनजान किंतु शानदार जगह पर अब भी रहता है और ‘जडों की ओर लौटने’ पर काम कर रहा है।
तीसरा और अंतिम संस्करण यह है कि वह जडों की नहीं, उस बकरी की तलाश में ही वहां पहुंचा था। उसने बकरी को भागते-भागते अंततः आमेर की घाटियों में पकड लिया और उसे समझा-बुझाकर उसकी पार्टनरशिप में एक डॉटकॉम कंपनी खोल ली। अब कवि साइबर स्पेस में रहता है, नायला डॉटकॉम जैसा कुछ चलाता है और ऑनलाइन जडें बेचता है। जडों की तलाश के लिए बेचैन दुनिया का वह सबसे बडा सहारा है। कहते हैं कि कई संपादक, लेखक, पत्रकार अपनी जडों के लिए इसी पर लॉग इन करते हैं। कवि जो है, अपनी जडों समेत, बिल गेट्स की कंपनी ज्वाइन करने जा रहा है।
कुछ पाने के लिए कुछ धोना पडता है
जैसे भी हो, आदमी की कोशिश रहती है कि वह उजली कमीज पहने।
कंपनियाँ कितने ही वर्षों से इस प्रयास में लगी हैं कि आप दाग लगाएँ और वे चमकाएँ-दमकाएँ। खासतौर पर जब हर माँ को गर्व हो कि हर शालू को इस बार इंग्लिश स्कूल में डाला गया है और हर इंग्लिश स्कूल में सफेदी पर दाग जरा भी नहीं चलता। आखिरकार एक कंपनियां मदद करती हैं और एक दिन ‘शालुएं’ क्लास की मॉनीटर हो जाती हैं तथा क्लास की सभी लडकियों की ड्रेस वे ही जाँचती हैं।
उस दिन प्रधानमंत्री हमेशा की तरह टेलीविजन पर भाषण दे रहे थे। बिटिया ने मुझे टोका, ‘पापा इनका कुर्ता इतना सफेद कैसे?’ मैं आमतौर पर कमीज-कुर्ते पर नहीं जाता। भाषण और भंगिमा पर जाता हूँ। चेहरे पर तेज हो, होंठों पर जीभ फिर-फिर फिराई जा रही हो और शब्दों में पाँच-पच्चीस बार प्रगति या विकास आ जाए तो बहुत होता है लेकिन जब बच्ची ने पूछा तो मुझे भी लगा कि आखिर पी.एम. का कुर्ता इतना सफेद कैसे? मैंने शुद्ध, उत्तर दिया, ‘प्रधानमंत्री क्लीन है। उनका किसी घोटाले में नाम नहीं है, इसलिए उनका कुर्ता स्वाभाविक रूप से उजला-उजला है।’ बच्ची को तसल्ली नहीं हुई। उसने कहा, ‘मैंने एक बार एक-दूसरे बडे नेताजी को भी टी.वी. पर देखा था। उनका कुर्ता भी सफेद झक दिखा। पर कहते हैं, उन पर किसी घोटाले में शामिल होने का अंदेशा है।’
मैं इस बहस के बाद से लगातार सोच रहा हूँ कि दोनों की कमीजें कैसे उजली हो सकती हैं? आखिर हर राजनीतिज्ञ की कमीज उजली क्यों दिखाई देती है। टीवी पर किसी की कमीज में कोई दाग नजर नहीं आता। ये इंग्लिश स्कूल में भी नहीं पढते और शालू की माँ बच्चे के कपडे उजले करने और उन्हें मॉनीटर बनवाने के बाद इतना पावडर कैसे बचा लेती है कि इन लोगों की कमीजें भी उजली दिखें?
एक पार्टी प्रवक्ता का कहना है कि उजलापन लाने-दिखलाने के लिए किसी सबूत की जरूरत नहीं। यदि आपकी कमीज उजली नहीं है तो हमारे नेता की कमीज पर शक उठाकर वह मैलापन कम नहीं किया जा सकता। दूसरी पार्टी के प्रवक्ता का बयान है कि उनके यहाँ जो निक्कर-कमीजें हैं, वे हमेशा स्वदेशी साबुन से चकाचक धोकर ही पहनी जाती हैं। उनका उजलापन खाँटी भारतीय है। उसमें संस्कृति की चमक है और मिट्टी का यदि कोई लेना-देना भी है तो वह कमीज के दाग से नहीं, सौंधी खुशबू से ताल्लुक रखता है।
एक तीसरे दल के नेता भी अचकन के भीतर काफी उजले कमीज वाले हैं। उनके एक समर्थक का कहना है कि वे तो उसी साबुन से बाल धोते हैं, जिससे कमीज धुलती है। इसलिए दोनों एक-से चमकते हैं। एक लीडर ने मंजूर किया कि चंदा उन्होंने लिया था, तो उसका अर्थ यह नहीं है कि उनकी कमीज मैली थी। कॉलर पर दाग था बस, जो एक कमीज को दो दिन पहनने पर हो ही जाता है। इस देश में आम लोग, जिनका सामाजिक न्याय में विश्वास है, बचत की दृष्टि से ऐसा करते आए हैं। नेता तो सिर्फ जनविश्वास के मारे ह। फिर जो राशि ली गई, उसे पार्टी की कमीजों की धुलाई में ही तो खर्च किया गया था ताकि सब लोग उजली कमीजें पहन सकें।
जिन लोगों पर घोटाले का नाम नहीं चिपका है, वे आजकल कमीजों के मामले में बहुत मुखर हैं। जैसे एक वित्त मंत्री ने कहा था कि वे एक हवाला आरोपी के साथ गोल्फ खेलते थे, पर उससे पैसे कभी नहीं लिए। यानी उनकी कमीज उजली है और गोल्फ खेलने से कमीज के मैले होने का कोई संबंध नहीं आता। निष्कर्ष यह कि सभी लोगों को चाहिए कि वे हवाला लेन-देन के माहिर लोगों के साथ गोल्फ खेलें। इससे शरीर में चुस्ती-फुर्ती बनी रहती है और कमीज भी मैली नहीं होती। सवाल सिर्फ कमीज का और साबुन की ब्रांड का है।
हमारे एक मित्र कह रहे थे कुछ पाने के लिए कुछ धोना पडता है। एक हवाला-सम्राट राजनीति की लॉन्ड्री चलाते थे। कई कमीजें धोते-प्रेस करते उन्होंने लोकतंत्र की सेवा की। अब यदि उन्हें कुछ हो गया तो लोकतंत्र की कमीजों का क्या होगा?
राजनीतिक लॉन्ड्री के अनुभवी कहते हैं, कुछ पाने के लिए निश्चित ही बहुत कुछ धोना पडता है। हाथ धो बैठना या हाथ धोकर पीछे पड जाना दोनों में जिगर चाहिए। धोने के पावडर बनाने वाली कंपनियाँ पहले उजली कमीजों पर तुलनात्मक अध्ययन करवा चुकी है। उसमें पाया गया था कि राजनेता मैली कमीजों-उजली कमीजों के विज्ञापन के बाद से ज्यादातर रंगीन और गहरे रंग की वेशभूषा धारण करने लगे हैं ताकि उजलेपन के बेवकूफाना मामलों से छुट्टी पाई जा सके। जैसे दाँत माँजने वाली कंपनियों ने उजलेपन को एक ट्यूब में बंद करने में महारत पा ली है, वैसे ही सिर्फ दो कमीजों से वाशिंग पावडर वाले दुनियाभर का उजलापन पोलिथिन की थैलियों में पकडकर डाल चुके हैं।
एक बच्चा जीतते-जीतते रह गया। एक घर वाला इनाम पाते-पाते कमीज के उजलेपन की कमी से पिट गया। एक लडकी इसी उजलेपन की वजह से क्लास में मॉनीटर बन गई और एक औरत अपनी सहेली के साथ ऊँची साडी की दुकान में घुसी तो चौकीदार तक ने उसे हिकारत से और सहेली को इज्जत से देखा क्योंकि सहेली की धुलाई किसी और डिटर्जेन्ट से हुई थी। लेकिन इतनी उजली बातें, मेरी बेटी की समझ में नहीं आती। उसे एक कमीज का असली उजलापन तभी समझ में आता है जब साबुन की प्रचारक बाई साथ में एक मैली कमीज भी रखे। वर्ना दो मैली भी साथ हों, तो दोनों उजली लगती हैं।
मुझे लगता है बिटिया ने दोनों ही कमीजें एक-सी देखी थीं।
और अब तो कीचड को पीटते बच्चे, बहन की गंदी होती यूनिफॉर्म को देखकर कहते हैं- दाग अच्छे हैं।
जो सहमत हैं, सुनें!
भैंसों के बारे में आमतौर पर बहुत सहानुभूतिपूर्ण रवैया अख्तियार किया जाता रहा है। वे बहुत विनम्र, मितभाषी तथा अहस्तक्षेपकारी होती हैं। वे पगुराती हैं तो भी शून्यवाद की साधक दिखाई देती है और मटमैले पानी में विश्रान्ति पाती है, तो भी उनके साधक व्यक्तित्व में निखार ही आता है। दो-एक बार पटना के हवाई अड्डे पर हवाई जहाज इसलिए नहीं उतर सका कि पट्टी पर भैंसें बैठी हुई थीं। भैंसें विमान को वापस करने आई थीं या अपने भोलेपन में हवाई-पट्टी तथा साधारण सडक में फर्क नहीं कर सकीं-जो भी हो, इस बात पर सहमत हुआ जा सकता है कि यदि भैंसें अपने संपूर्ण भैंसत्व का इस्तेमाल करने पर आ जाएँ तो जमीन-आसमान एक कर सकती है। वास्तव में, भैंसत्व की सबसे बडी शक्ति है सहमत होना। अमूमन ख्याल यह किया जाता है कि भैंसों का कोई अभिमत नहीं होता, इसलिए उन्हें हर वक्त सहमत माना जा सकता है, लेकिन ताजा घटनाएँ संकेत करती हैं कि उनकी हर सहमति में कोई अभिमत छुपा रहता है। चूँकि वे दुधारू हैं, इसलिए उनका मत-मूल्य बहुमत का नियंता है। चूँकि वे काली हैं इसलिए उनका श्वेतांक समस्त कार्य-व्यापार का चालक है।
भैंसें सहमत होती है, तो किसी सरकार से कम नहीं होती।
‘सहमत’ होने पर मैंने एक भैंस से पूछा, जो पटना से आई थी, पटने जा रही थी, अब पटने में स्थायी रूप से रहने का उसका इरादा था और पटना को छोड अपनी सहमति के पोस्टर वह किसी तीर्थ को न देने का निश्चय किए बैठी थी। उसने बताया कि सहमत होने के लिए कुछ ज्यादा नहीं लगता-एकाध मुद्दा, एकाध मंत्री, एकाध तगारी जिसमें लगातार प्रचार की खली और भूसा रखे जा सकें। भैंसें आमतौर पर काली होती हैं और मंत्री का मतलब आमतौर पर उस काली गेंद से लगाया जाता है, जो भौतिक शास्त्र के सिद्धांत के अनुसार पानी में डुबोयी जाए तो चमकीली दिखाई देने लगती है। गेंद तीर्थ के घाट पर पवित्र पानी में उतरे, सांस्कृतिक मंत्रोच्चार हो तो संस्कृति रसोइयों को चमकार के उपलक्ष में स्वादिष्ट प्रसाद बनाने से कोई रोक नहीं सकता।
‘पटनाइयाई’ भैंस से मैंने आग्रह किया कि वह राजनीति में जाए बगैर सहमत होने पर विचार करे। वह पटना की हवाई पट्टी पर पसरी भैंसों का विचार व्यक्त करने लगी कि, भैंसें कैसे कभी तय नहीं करती कि पगुराने तथा खाने की सीमाएँ किस दिशा में खत्म होती हैं। लोग समझते हैं कि इनके बैठे हुए झुंड में कोई ‘ऑर्डर’ नहीं होता। किसी का चेहरा किधर, किसी का किधर, किसी की पीठ पर कौआ, किसी की दुम पर मक्खी। लेकिन वस्तुतः वे जब सहमत होती हैं तो मुँह या पूँछ की दिशाओं से ऊपर उठ चुकी होती है।
खालिस भैंस को दुहना खालिस क्रिया है, सहमत भैंस को दुहना मिश्रित कला है। ऐसी भैंस कभी-कभी बाएँ देखती है, कान फडफडाती है, पिछली टाँग को थरथराते हुए झटकती है तथा निर्देशक से पूरी पटकथा की माँग करती है। पटकथा पढने, उसके जँचने, संवादों में अपेक्षित जोर डालने और उसे अपने भीतर उतारने तक भैंस, भैंस नहीं रहती इतिहास के तथ्यों का मनचीता महानायक हो चुकी होती है। कभी-कभी भैंस दायें भी देखती है, आँख भी घुमाती है, अगली टाँग उठाती है तथा निर्देशक की पटकथा में लापरवाह ढंग से पसर जाती है। तब भी भैंस, भैंस नहीं रहती नुक्कड पर सांस्कृतिक पुनर्जागरण का स्मारक हो जाती है। सहमत भैंस का गोबर भी प्रेमचंद के सर्वहारा नायक की शक्ल में, दीवाली के दूसरे दिन पूजा के लिए दरवाजे के सामने थापा गया, गोवर्धन होता है। एक घटिया कहावत यह है कि वह भैंस को स्वामी की पहचान कराती है। ऊँची असलियत यह है कि सहमत भैंस, अपनी सहमति का प्रायोजक खुद चुनती है। वह जानती है/कहती कुछ नहीं/सहमत होने के पहले/बस थोडी सी पगुराती है/धीरोदात्त नायक और गजगामिनी नायिका के मिलन-सी कविता में खोकर/खिडकी के बाहर थूके गए पान पर/मुस्कुराती है/वह भुवन मोहिनी/खली की क्वालिटी पर सहमत हो जाती है।
सहमत भैंस की अपनी विचारधारा होती है, एक सिर-दो कान-एक पूँछ और चार खुरों से बनी। कीचड के प्रतिक्रांतिवाद तथा ट्रैफिक की तानाशाही के विरुद्ध, वह कौओं से भी आँख का कीचड सापु करवाने में शान्ति पाती है। उसके सींग होते हुए भी नहीं होते, नहीं होते हुए भी होते हैं। कई बार उनके मोडों तथा नोंकों के चलते वे खोजपूर्ण शोधपत्रों के महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष प्रतीत होते हैं। हैं। वे फिर भी, निरापद होते हैं तथा दुहने वाले व भैंस की सहमति में बाधक नहीं होते। विचारधारात्मक झुकाव में, सहमत भैंस इस प्रचलित धारणा का खंडन करती है कि बीन उसके आगे कोई अर्थ नहीं रखती। सहमत भैंसत्व सदैव बीनत्व के केन्द्र में होता है। सहमतियाँ, साँप और भैंस दोनों को संभाल सकती हैं यदि वे संसाधनों की मानवीयता से ऊपर उठ जाएँ।
मुझे जो ‘पटनाइयाई’ भैंस मिली थी, उसकी सहमति में मुझे हवाई पट्टी पर अमीरों के खिलाफ प्रदर्शन की ‘बू’ आई थी। लेकिन वह मेरे निष्कर्ष पर प्रफुल्लित होने की बजाय नाराज हुई। और ज्यादा पटनाते हुए उसने कहा, ‘मैं अयोध्या से डेपुटेशन पर इधर आई थी। मेरा इरादा था कि इधर ही रह जाऊँ, एक राजकीय पशु की सम्मानित शैली में। लेकिन तुम मुझे रहने नहीं दोगे।’
जो सहमत हैं सुनें, उस भैंस ने कहा, ‘अब हम उड्डयन मंत्रालय से सहमत होने जा रही हैं क्योंकि धर्म निरपेक्षता की केबिनेट में ‘रिशफल’ की खबर है।’
धर्मनिरपेक्षता की केबिनेट में ‘रिशफल’ का किस्सा पुराना है। भैंस की सहमति जारी रहेगी, तब तक, जब तक कि वह दंगे के कीचड में एक बार लोट नहीं लगा लेती।







